SIDO-KANHU

झारखंड़ में बिरसा मुंड़ा के जन्म से कई वर्षों पहले संताल परगना के भगनाडीह गांव में चुनका मुर्मू के घर चार भाईयों यथा, सिद्धू, कान्हू, चांद एवं भैरव तथा दो बहनें फूलो एवं झानो मुर्मू ने जन्म लिया। सिद्धू मुर्मू अपने चार भाईयों में सबसे बड़े थे तथा कान्हु मुर्मू के साथ मिलकर सन् 1853 से 1856 ई. तक 'संताल हूल' जो अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ लड़ा गया, का नेतृत्व किया। भगनाडीह ग्राम में 30 जून 1855 को सिद्धू एवं कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में
एक आम सभा बुलाई गयी जिसमें भगनाडीह ग्राम के जंगल तराई के लोग तो शामिल हुए ही थे, दुमका,देवघर, गोड्डा, पाकुड़ जामताड़ा, महेषपूर,कहलगांव, हजारीबाग, मानभू, वर्धमान, भागलपूर,पूर्णिया, सागरभांगा, उपरबांध आदि के करीब दस हजार सभी समुदायों के लोगों ने भाग लिया और सभी ने एकमत से जमींदारों, ठीकेदारों, महाजनों
एवं अत्याचारी अंग्रेजों एवं भारतीय प्रशासकों के
खिलाफ लड़ने तथा उनके सभी अत्याचारों से
छुटकारा पाने के लिए दृढ़ संकल्प हुए तथा सर्व
सम्मति से सिद्धू एवं कान्हू मुर्मू का अपना
सर्वमान्य नेता चुना। अपने दोनों भाईयों को
सहयोग देने के लिए सिद्धू एवं कान्हू मुर्मू के दो अन्य भाई चांद और भैरव मुर्मू भी इस जनसंघर्ष में कंधे से कंधा मिलाकर लड़ा एवं अपना सर्व न्योछावर किया 30 जून 1855 को सभी एकमत थे कि अब और नहीं सहेंगे और उन्होंने तय किया कि इस साल धान नहीं अत्याचारी अंग्रेजों और उनके समर्थकों के गर्दनों की फसल काटेंगे।
संताल विद्रोह के साथ संताल परगना की धरती
लाशों से बिछ गयी, खून की नदियां बहने लगी।
तोपों और बंदूक की गूंज से संताल परगना और उसके आसपास के इलाके कांप उठे। संताल हूल की भयानकता और सफलता इस बात से लगायी जा सकती है कि अंग्रेजों के करीबन दो सौ साल के शासनकाल में केवल इसी आंदोलन को दबाने के लिए मार्शल लॉ लागू किया गया था जिसके तहत अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों एवं उनके समस्त सहयोगियों को कुचलने के लिए अमानुषिक अत्याचार किए जिसका जिक्र इतिहास के पन्नो में पूर्ण रूप से नहीं मिलता है परंतु अमानुषिक अत्याचारों की झलक संताली परम्पराओं, गीतों, कहानियों में आज भी झारखंड़ में जीवित है।
संताल विद्रोह विश्व का पहला आंदोलन था
जिसमें औरतों ने भी अपनी समान भागीदारी
निभाई थी। भारत का यह दूसरा महान जन
विद्रोह था। सन् 1831 ई. का कोल विद्रोह भारत
का प्रथम महान विद्रोह था तथा सन् 1857 का
सैनिक विद्रोह भारत का तीसरा महान विद्रोह
माना है। सन् 1855 ई. के संताल विद्रोह में
अंतर्निहित शक्ति का अंदाजा इस बात से लगाया
जा सकता है कि अंग्रेजों ने उनके विद्रोह की
शक्ति कम करने के लिए बिना मांगें भारत का सबसे पहला आदिवासी नाम का प्रमंडल ‘संताल परगना' का निर्माण किया तथा ‘संताल परगना
काश्तकारी अधिनियम’ बनाया। इसमें कोई दो मत नहीं कि भारत का प्रथम राष्द्रीय आंदोलन कहाजाने वाला सन् 1857 का सैनिक विद्रोह बहुत कुछ संताल विद्रोह के पद चिन्हों पर चला और आगे इसी तरह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की अग्निप्रज्वलित करता रहा।
संताल हूल का महत्व का अंदाजा इस बात से
लगाया जा सकता है कि जर्मनी के समकालिन
चिंतक ‘कार्ल मार्क्स’ ने अपनी पुस्तक ‘नोटस ऑफ़ इंडियन हिस्द्री ' में जून 1855 के संताल हूल को जनक्रांति की संज्ञा दी है। परंतु भारतीय
इतिहासकारों ने आदिवासियों की उपेक्षा करते
हुए इतिहास में इनको हाशिये में डाल दिया
परिणामस्वरूप् आज सिद्धू, कान्हू, चांद, भैरव मुर्मू व इनकी दो सगी बहनें फूलो एवं झानो मुर्मू के योगदान को इतिहास के पन्नो में नहीं पढ़ा जा
सकता है। झारखंड़ के बच्चों को उपरोक्त
महानायकों एवं नायिकाओं के संबंध में पढ़ाया ही नहीं जाता है हूल क्रांति या विद्रोह आज भी
प्रसांगिक है क्योकि जिस उद्देश्य से सिद्धू और
कान्हु मुर्मू ने विद्रोह की शुरूआत की थी वह आज 158 वर्षों के बाद भी झारखंड़ के आदिवासियों को हासिल नहीं हो पाया है। झारखंड़ राज्य के गठन के बाद आज तक मुख्यमंत्री व कई मंत्री आदिवासी रहे परंतु आदिवासियों का शोषण निरंतर जारी है। राज्य में जहां 'अबुआ दिशोम' का नारा भी हाशिये में चला गया वहीं दूसरी ओर राजनीतिक व वैचारिक शून्यता के कारण जल, जंगल, जमीन को लेकर आज भी राज्य के आदिवासी संघर्षरत है।
राजू मुर्म

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